Random musings

Mental well-being is as important as physical well-being. I have heard people say that if you ignore things that bother you and focus on what makes you feel better, focus on your work then you will be fine. What would people do or what should they do if they are not in a place to make a difference between what is actually bothering them and even if they can pin point that factor, they don’t feel that they can make it go away. They are not able to focus on anything positive. They don’t know how to do that. What do they do then?
People say if you overthink about things, that may be the cause for your anxiety. Well what does on do if he is not able to ‘underthink’ (why isn’t this a dictionary word?) about a certain event, person or thing?
People say its just vogue to talk about mental health and depression. It is being caused by the modern lifestyle. Well, maybe there is some truth in the statement that a certain lifestyle can mess with one’s mental health or cause anxiety but that is not it. That cannot be it. The society cannot just shrug its shoulders by putting the blame on the person itself for choosing a lifestyle. An individual can be placed in a context without its choice and any context will have a number of aspects associated with it where each aspect alone or more than one aspect in conjunction carry may have the force to destroy that individual’s health.
At this point, I don’t even know what I want to convey by writing what I am writing. May be just tthis much, that mental health is important. One’s mental health can be destroyed by factors beyond one’s control. And no, its not an escape. It is a cave.
There are not enough words to describe what is it like to feel depressed. There are not enough words to describe the feeling when one knows something is not right with them, but that something doesn’t have a physical locus.

इज़्ज़त की माँ।

एक माँ थी। यही कुछ बीस बरस की रही होगी। उसने अभी तक किसी को अपनी कोख से जना नहीं था पर फिर भी वो माँ थी। अभी तो उसकी शादी भी नहीं हुई थी। पर लग्न निकल आया था और जल्द ही होने वाली थी, होने वाला पति उम्र में ज़्यादा नहीं पर सात-आठ साल बड़ा तो था ही। आपको लग रहा होगा जब किसी को जना ही नहीं तो कैसे माँ हो गई। वो माँ हो गई थी क्यूँ कि वो त्याग कर रही थी, अपने छोटे भाइयों के भंगुर खिलौनों के लिए अपनी ज़रूरतों का त्याग, अपने पिता की ‘इज़्ज़त’ के लिए अपने सपनों का त्याग। उसको एक रोज़ पता चला कि उसकी माँ कम रोटियाँ बनाती है और सब को पेट भर खिला के ख़ुद कम खाकर रह जाती है, उसकी माँ को लगता है कि इससे राशन ज़्यादा दिन चलेगा। अगले रोज़ वो अपनी माँ से कहती है, “माँ, आज से खाना मैं बनाऊँगी। आप पिताजी और भाईयों के साथ खाया करिए।”
माँ एक पल में समझ जाती है कि मेरी बेटी आज मेरी माँ होना चाहती है। मेरे लिए त्याग करना चाहती है। दोनों के बीच अश्रुपूरित संवाद होता है त्याग को लेकर। अन्ततः निश्चय होता है दोनो साथ में खाना पकाएँगी, दोनों कम खाएँगी। राशन और भी ज़्यादा चलेगा। घर के पुरुषों को लगता है की क्या प्रबंधन कर रही हैं घर की स्त्रियाँ।
उसकी शादी हो गई। वो अभी भी माँ है। उसने अभी भी किसी बच्चे को नहीं जना है। पर वो अपने पति के लिए त्याग कर रही है। पति को शराब का शौक़ है, नशे में मारता है, पीटता है, पर वो तब भी चूँ नहीं करती, क्यूँ की अब उसको उस बेग़ैरत पति के मर्यादा की चिंता है। वो उस घर के हर सामान को भी मातृत्व की नज़रों से देखती है। एक एक सामान को सम्हाल के रखती है, एक एक कोने को यूँ साफ़ करती है जैसे अपने बच्चे को नहला धुला कर अंजन लगा रही हो।
अब उसका एक बेटा हो गया था। समाज की नज़रों में अब वो माँ बन गई थी। शराब के चलते उसके पति को घर की किसी बात से कोई सारोकार नहीं था। वो माँ अपनी बचत से, चुपचाप घर का सामान बेचकर अपने बेटे को पढ़ाने की, उसकी ज़रूरतें पूरी करने में लगी है। पति को इसकी जानकारी मिलती है, मारना पीटना गली गलौज बढ़ जाता है। चोटों के निशान अब दिखाई देने लगे हैं। लोग पूछते हैं तो रोज़ अलग अलग बहाने बनाती है, कभी गिरने का, कभी जलने का।
बेटा बड़ा होने लगता है, होशियार है पढ़ाई में।मेडिकल कॉलेज जाने वाला है।पति अब शराब छोड़ देता है, बेटे के कॉलेज की फ़ीस भरता है। बेटा बड़ा डॉक्टर हो जाता है, अपनी तनख़्वाह से नई गाड़ी ख़रीदता है, और लाकर अपने पिता को भेंट करता है। माँ ख़ुश है कि बेटा घर आया है, बाप ख़ुश है कि गाड़ी लाया है। माँ अभी भी चूल्हे में रोटी पका रही है, बाप अब गाड़ी से जाकर बार में शराब पी रहा है।
बेटा नए शहर में बड़े से घर में रह रहा है। उसकी शादी हुई है, जिससे हुई है वो भी माँ है। शादी के पहले से ही। उसको शायद ख़ुद खाना नहीं बनाना पड़ता, नौकर रखे हैं डॉक्टर साहब ने।
उसका बाप अभी भी हाथ उठाता है उसकी माँ पर, लेकिन वो अब भी मुँह नहीं खोलती क्यूँ कि अब बेटे की भी इज़्ज़त की फ़िक्र है।अब उस इज़्ज़त की भी माँ हो गई है वो। उसको डर है कि कहीं ‘इज़्ज़त’ को कुछ हो ना जाए।
वो माँ अभी भी घर के किसी कोने को साफ़ कर रही है, चूल्हे में खाना बना रही है कि उसके बेटा बहू आने वाले हैं।

-अभिषेक यादव

बाक़ी है अभी!

मोहब्बतों के दुनिया में मकान बाक़ी हैं अभी,

कम बचे हैं, मगर ‘इंसान’ बाक़ी हैं अभी,

यक़ीं है ये सुख़न की फ़नकारी यूँ ख़त्म ना होगी

इंशल्लाह, यहाँ उसके कद्रदान बाक़ी हैं अभी!

हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया, मगर ये उसका ही नूर है

जवाँ महफ़िलों में शायरों की शान बाक़ी है अभी!

थोड़ा लगाम लगा लो अपने उंस की नुमाइश में यहाँ,

शहर से निकल कर फिर रास्ता सुनसान बाक़ी है अभी

बच्चों की भूख तहज़ीब की बंदिशें नहीं जानती,

वो कितना ज़ब्त करें भला, गर मेहमान बाक़ी हैं अभी!

थक गए क्या हुकुमती तरानो से, इतने में ही

हुकूमत बाक़ी है उनकी, फ़रमान बाक़ी हैं अभी

हमें लगा था कि ये गंदगी यूँ ही ख़त्म हो जाएगी,

पर मसनददारों के बीच बेईमान बाक़ी हैं अभी

अपना झूठ छुपाने को यहाँ, जितनी चाहे काटो

हर एक शायर के मुँह में सैकड़ों ज़बान बाक़ी हैं अभी

जब बोलना तो ख़ुदा के वास्ते आवाज़ें नीची रखना

जो दीवारें खड़ी हैं यहाँ, उनके कान बाक़ी हैं अभी

यूँ अलविदा बोल कर कहाँ ठहर रहे हो हमराही

बाक़ी है सफ़र तेरा-मेरा,इमतहान बाक़ी हैं अभी

सफ़र में रास्ता खो जाना ग़ोया जुर्म थोड़े है,

हिम्मत है, जज़्बा है, अरमान बाक़ी हैं अभी

तुम्हें क्या लगा था, काफ़िरों का कोई सहारा नहीं होता

हम पे इनायत करने को मेहरबान बाक़ी हैं अभी

जाते हुए तुम अपना सब ले तो गए थे, फिर भी,

ऐसा लगता है, मेरी जान में तुम्हारी जान बाक़ी है अभी

मोडेरनिटी में वो गाँव का घर जल के खंडहर हो गया,

पर वहाँ के बुझे- बूढ़े चेहरों पे मुस्कान बाक़ी है अभी

उस खंडहर में तुम्हें नहीं जाना, मत जाओ पर ये ना भूलो

तुम पे उस मिट्टी, उस पसीने का एहसान बाक़ी है अभी

तुम सरसरी ज़िंदगी बसर करके,उनसे सवाल करते हो?

जिनके ज़िंदगी के लहजे में इत्मिनान बाक़ी है अभी

परिंदे सब शहरों में आ गए, अपनी हक़ीक़त छोड़ कर

वो भूले हैं के जंगल में क़ीमती सामान बाक़ी है अभी

बाँट ली ज़मीन भाइयों ने मगर माँ का ख़याल सब करते हैं

शायद माँ के नाम पे दर्ज वो पुश्तैनी दुकान बाक़ी है अभी

एक दूसरे की आबरू वो बाज़ार में ख़ुद ही बेचा करते हैं,

साथ में कहते जाते हैं हमारा ख़ानदान बाक़ी है अभी

दो कौर रोटी जिनको रोज़ नसीब नहीं होती ना, वो नवराते

का व्रत भी रखता है और कहता है रमज़ान बाक़ी है अभी

इक़बाल का तराना अधूरा है, मीर का दीवान बाक़ी है अभी

ज़फ़र की उम्मीद ज़िंदा है, फ़ैज़ का जहान बाक़ी है अभी

-अभिषेक यादव

एक दूसरे को क्यूँ इतना बुरा बताते हैं

लोग इतनी नफ़रत आख़िर कहाँ से लाते हैं

जीने को मजहब से ज़्यादा खाना ज़रूरी है

चैन से फिर क्यूँ दो वक़्त रोटी नहीं खाते हैं

सियासत की रोटी भला किस आटे की होती है?

जिसको सेकने को नेता, यहाँ बस्ती जलाते हैं!

-अभिषेक यादव

क़द्र

मोहब्बतों के दुनिया में मकान बाक़ी हैं अभी,

कम बचे हैं, मगर ‘इंसान’ बाक़ी हैं अभी

यक़ीं है फ़नकारी यूँ ख़त्म ना होगी यहाँ

इंशल्लाह, उसके कद्रदान बाक़ी हैं अभी!

-अभिषेक यादव

सुकून

"इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से… निगाहों निगाहों में…"
फ़ोन से बहुत धीमे धीमे रफ़ी साहब की आवाज़ आ रही थी! वहीं पास में ही आराम कुर्सी में बैठे बैठे तन्वी आसमान को निहार रही थी। रविवार की शाम वो अक्सर यूँ ही पोर्टिको में बैठ कर रफ़ी साहब को सुनते हुए गुज़ारती थी। हफ़्ते भर की भाग दौड़ के बाद यही कुछ पल उसके अपने होते थे! इन पलों को वो किसी के साथ भी साझा नहीं करना चाहती थी।

आज यही कोई बीस साल होने को हैं जब तन्वी दिल्ली छोड़ कर यहाँ टनकपुर आयी थी। उसकी फ़र्राटेदार अंगेजी ने उसे तुरंत यहाँ एक स्कूल में नौकरी दिला दी थी और तब से वो इस स्कूल में पढ़ा रही है। जब वो दिल्ली छोड़ कर इस शहर के लिए निकली थी तो सोचा था कि पहाड़ों की सोहबत में बसे इस छोटे से शहर में उसको सुकून मिलेगा, कम लोग, कम शोर।
पर जिस सुकून की नादिया में वो गोते लगाने आयी थी, वो तो नहीं मिली अभी तक, पर हाँ, एक नहर मिल गई है, जिसमें वो हर रविवार की शाम यहीं पोर्टिको में बैठ कर डुबकी लगाती है।

अपने ख़यालों में खोई जाने क्या सोच रही थी।"तुम जो मिल गए हो, ये जहाँ मिल गया…, एक भटके हुए राही को…", रफ़ी साहब गा रहे थे अभी भी, तन्वी भी वहीं बैठी थी वैसे ही, मगर अब वो शायद सुन नहीं रही थी।सोच में ऐसे बैठी थी जैसे कोई उसको 'स्टैचू' बोलकर, बिना 'मूव' बोले भाग गया हो।"…चाँद ने कहा चाँदनी की क़सम, नहीं, नहीं, नही…"। लॉन के पेड़ों में बैठी चिड़ियाँ रफ़ी साहब के साथ साथ गुनगुना रही थी!
गेट के बाहर गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी, तन्वी की साधना भंग हो गई। हड़बड़ा कर कुर्सी से उठी, कॉफ़ी टेबल से दुपट्टा उठा कर डाला और गेट की तरफ़ बढ़ी।मन कुछ अजीब सा था उसका पर क़दम बढ़ते गए। गेट खोला और चिल्ला पड़ी
-अरु! तू??
अरुणिमा बिना कुछ बोले गाड़ी से चार क़दम आगे बढ़ी और दोनो लगे लग गए।
अरुणिमा उसकी कॉलेज की दोस्त थी। दोनो ने साथ में काफ़ी अच्छे और बुरे पल गुज़ारे थे! पच्चीस-छब्बीस साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय की सड़कों पर बिताए वो पल दोनो की आँखों के सामने से किसी फ़िल्म की तरह गुज़र रहे थे और उनकी सिसकियाँ उस फ़िल्म को बैक्ग्राउंड म्यूज़िक दे रही थीं। कुछ देर वो दोनो यूँ ही खड़ी रहीं! जब यादों का तूफ़ान कुछ शांत हुआ तो अपना मुँह पोछते हुए तन्वी बोली,
-आजा अंदर चल!
अरुणिमा बिना कुछ बोले उसके पीछे पीछे चल पड़ी।
"…खोई नज़र थी, सोए नज़ारे, देखा तुम्हें तो जागे ये सारे…!" पोर्टिको में आकर तन्वी ने रफ़ी साहब की आवाज़ को आराम दिया, लैम्प ऑन किया और आराम कुर्सी में वापस बैठ गई, अरुणिमा टेबल के दूसरी तरफ़ आकर बैठ गई। ख़ामोशी में बैठे दोनो टेबल को देख रहे थे, जैसे उस टेबल में कोई गूढ़ रहस्य छुपा हो। टेबल को घूरते हुये ही अरुणिमा बोली,
-कैसी है तन्वी?
-ठीक ही हूँ । तू बता कैसी है तू? यहाँ कैसे आई? ऐड्रेस कहाँ से मिला? कैसे ढूँढा।
-मैं तो बस तुझसे मिलने चली आयी! तू अचानक से ग़ायब हो गई, सारे सोशल मीडिया से भी हट ही गई थी। ना कुछ सुना, कहा। ना…
अरुणिमा की बात बीच में ही काट कर तन्वी बोल पड़ी,
-अरु। अभी नहीं ग़ायब हुई मैं। बीस साल हो गए मुझे दिल्ली से आये, फिर आज अचानक क्यूँ??
-पता है मुझे भी की बीस साल हो गए।तुझे तो किसी से कोई मतलब है नहीं। सब एक पल में ख़त्म कर के ग़ायब हो गई। अब मैं इतनी दूर से आई हूँ तो उलटा मुझसे लड़ रही है।नहीं बात करनी ठीक से तो चली जा रही हूँ वापस!
बोलते बोलते अरुणिमा का गला रूँध गया। उसकी बड़ी बड़ी आँखें पानी से लबालब हो गई थीं। उसके मुँह से फिर और एक शब्द ना निकला, वापस नज़रें गड़ा कर टेबल को देखने लग गई।

अरुणिमा हमेशा से ही ऐसी थी, ग़ुस्सा किसी पर होती थी, निकालती अपनी आँखों से थी।और अरुणिमा के ज़ेहन में जो तन्वी थी वो जिस पर ग़ुस्सा होती थी उस पर ही ग़ुस्सा निकालती थी। अरुणिमा ने मुँह को अपने साड़ी के पल्लू से पोछते हुए जब नज़र उठाई, तो तन्वी को देखकर घबरा गई।
ये वो तन्वी तो नहीं जिसको वो जानती थी। उसको तो कभी रोते नहीं देखा था इसने पर ये क्या ये तो रो रही थी। अरुणिमा को समझ नहीं आ रहा था की क्या बोले। और तन्वी, शायद फिर अपनी साधना में चली गई थी, फिर उसको किसी ने स्टैचू बोल दिया था। हालाँकि उसके आँसू बह रहे थे पर पलकें स्टैचू की थीं। नज़र टेबल पर गड़ाए शून्य में खोई हुई।

-क्या हुआ है तुझे? क्या हुआ 'था' तुझे? बता ना तन्वी?
अरुणिमा ने जैसे इस सवाल से मूव बोला हो। तन्वी ने आँसू पोछे और 'मुस्कुरा' कर बोली,
-कुछ नहीं यार। सुकून ढूँढने आ गई थी बस। तू बता, घर पर सब कैसे? शादी कब की थी? बच्चे वच्चे?
-जिस साल तू सब छोड़कर ग़ायब हुई, उसके अगले साल। उन्नीस साल होने को हैं शादी के। एक बेटी है पंद्रह साल की। तन्वी ही नाम रखा है उसका। अभी बोर्ड एक्ज़ाम दिए हैं, टेन्थ के। तूने शादी वादी?
-नहीं की। कोई साला मिला ही नहीं।
-तो अकेले ही रहती है यहाँ? सुनसान से इलाक़े में?
-इस घर में अभी तीन साल पहले ही शिफ़्ट हुई हूँ, पहले किराए का घर लिया था शहर के अंदर ही, फिर ये ख़रीद लिया। वैसे तुझे पता कैसे चला कि मैं यहाँ हूँ?
-मुझे तो अभी कुछ दिन पहले पता चला। उस वक़्त जब तूने अचानक सारे कांटैक्ट ख़त्म किए तो मैंने कई दिन तक कॉल मैसेज किये थे तुझे, फिर जब कोई रेसपॉंस नहीं मिला तो तेरे घर गई थी। अंकल आंटी ने वो नोट दिखाया था जो तू घर पर लिख के रख आई थी।
-याद है मुझे। आइ रिमेम्बर एवरी सिंगल मिनट ऑफ दैट डे। पर उस नोट में तो बस इतना ही लिखा था मैंने की दिल्ली छोड़ कर जा रही हूँ, परेशान ना हो वो लोग एंड ऑल।
-हाँ। ऐसे ही लिखा था तूने। दिमाग़ होता तेरे पास तब तो कुछ और लिखा होता। उसके कुछ दिन बाद ही मेरी जॉब लग गई थी, फिर शादी हुई। फ़ैमिली नौकरी इन सब के चक्कर में वक़्त नहीं मिला की तुझे ढूँढू। फ़ेसबुक वग़ैरह में कुछ कुछ दिनों में तन्वी नाम की प्रोफ़ाइल्स देखती रहती थी की शायद तू कहीं मिल जाए। फिर बेटी हो गई, ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती जा रहीं थी। बेटी का नाम तन्वी ही रखा की तेरी यादें ज़ेहन में फीकी ना पड़ें।
-क्या यार अरु! कोई और अच्छा नाम दिया होता।
-मैं भी सोचती हूँ अब।

तन्वी ने मुस्कुराते हुए फिर वही सवाल किया
-मगर मुझे ढूँढा कैसे तूने?
-अमर आए थे यहाँ किसी काम से पिछले महीने। उन्होंने देखा था तुझे तेरे स्कूल के बाहर। उन्हें पक्का नहीं था, पर फिर तेरे स्कूल से पता किया तो ऐड्रेस वग़ैरह मिला! फिर तन्वी के बोर्ड थे तो आ नहीं पाई!
कल फ़्री हुई, आज आ गई।
-किसी और को भी बताया क्या?
-नहीं रे। नहीं बताया।
-गुड! चल अंदर चलते हैं घर के, रात हो रही। डिनर के बाद बाक़ी बातें करेंगे!
-नहीं। पहले तू मेरे एक सवाल का जवाब दे?
-पूछ!
-क्यूँ आ गई थी रे? सच सच बता? सब को छोड़कर? बिना बताए? बिना बात?मेरी क़सम है।
-बताया तो सुकून ढूँढते आयी थी!
-फिर मिला ? सुकून?
-हाँ। मिला ना। आज मिला!!

/अभिषेक यादव

Random Musing.

कुछ यूँ चेहरा घुमा के उन्होंने,अपनी ज़ुल्फ़ों के रुबरू किया हमें,

एक पल को लगा जैसे अब्र आए हों आफ़ताब को हमारी नज़र से चुराने!

बीमारी!

शर्मा जी घर में ग़ुस्से से दाख़िल हुए और चिल्ला कर बोले
-बासू! बासू…! कहाँ मर गया सुअर का बच्चा! नीचे आ!

पिछले आठ साल से बासू इस घर में काम कर रहा है पर उसने कभी वक़ील साहब को इतने ग़ुस्से में नही देखा था! दूर से ही डरते डरते चिल्लाया

– जी साब! यहीं हूँ!
-सो रहा था क्या?
-नहीं साब, दिन में कहाँ सोता हूँ मैं!
-मुझे क्या पता की कहाँ सोता है! जब शाम को वापस आया करूँ, गाड़ी की आवाज़ सुन कर गेट पर आ जाया कर! बुलाना ना पड़े!
-ठीक है साब! पर कुछ बात हो गई क्या?
-सवाल नही! जितना कहा उतना गाँठ बाँध लो!

बासू कुछ ना बोला, बस सोचने लगा ,'भगवान जाने अचानक साब को क्या हो गया! एक बार तो मैंने ख़ुद ही पूछा था की जब वो आते हैं तो मैं गेट तक आ जाया करूँ क्या? तब ख़ुदहि मना कर दीन रहैं!'
बासू जब ख़ुद में कुछ सोचता था तो उसकी आख़िरी लाइन अक्सर खड़ी बोली के खेत के बाहर ही उपजती थी!

अगले दिन बासू दोपहर के बाद से बार घड़ी देखता जा रहा था! और जैसे जैसे वक़्त बढ़ रहा था, ख़ुद को दौड़ने के लिए तैयार कर रहा था। शर्मा जी का बंगला सिविल लाइन्स के सबसे ख़ूबसूरत और आलीशान बंगलो में एक था, और इस ख़ूबसूरती के 'चार चाँद' उनके लॉन में ही रहते थे! जब कोई घर की तरफ़ देखता था, वो चार चाँद तुरन्त लग जाते थे! बासू को घर के आख़िरी कोने में बनी रसोई से दौड़ कर इस लॉन को पार करते हुए गेट पर आना था, 'गाड़ी की आवाज़ सुनते ही!'

पाँच बजे के आस पास गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी और बासू झट से पहुँच गया गेट पर! शहर में आठ साल बीत चुके थे इसको पर अभी गाँव की फुर्ती थी उसमें। उसने आदेशानुसार अंदर से गेट खोल दिया पर शर्मा जी ने गाड़ी अंदर लाने की बजाय उसको इशारे से गेट के बाहर बुलाया। खिड़की का शीशा नीचे कर के बोले
-यहीं खड़े रहो कुछ देर!
-जी साब!

'साब सठिया गए हैं लगता है। अब यहाँ काहे को खड़ा किए हैं। कौनो नशा करैं लाग हैं का?' उसकी सोच की खेती उपज ही रही थी की उसकी नज़र सामने वाले बंगले पर पड़ी, उसके गेट पर भी एक आदमी खड़ा है, अपने साहब की गाड़ी के लिए गेट खोलने को।
बासू को कुछ अजीब लगा, और लगता भी क्यूँ ना। ये क़िस्सा तब का है जब गेटकीपर संस्कृति बम्बई में ही थी और इलाहाबाद के सिवल लाइन्स तक नही पहुँची थी।ख़ैर, सामने वाले बंगले की गाड़ी आई, उसके मालिक ने गाड़ी से ही शर्मा जी की तरफ़ देखा, तो बासू ने भी उनकी नज़रों का पीछा करके अपने साहब को देखा, शर्मा जी के चेहरे में गर्व की मुस्कुराहट थी। बासू को ये समझते देर ना लगी की उसके साहब को 'दिखावे की बीमारी' लग गई है! उसने इस बीमारी के दुष्परिणाम देखे हैं, एक पल को डर से वो अंदर तक काँप गया पर फिर ख़ुद को सम्हाल कर तुरन्त अपने साहब को सलाम किया। इस सलाम ने लॉन के चार चाँद बुला कर शर्मा जी की मुस्कुराहट में लगा दिए। सामने वाले बंगले के साहब के चेहरे में मुस्कुराहट कुछ फीकी पड़ गई।बासू को मन ही मन पता था की आज सामने वाले बंगले के बासू को निर्देश मिलेंगे कल से सलाम करने के!

बंगले के अंदर आकर शर्मा जी बोले
-बासू बेटा, आज खाना मत बनाओ। मैं बनाऊँगा दोनो के लिए!
-नहीं साब! आप? आप क्यूँ बनाएँगे?

-बना लूँगा बेटा, तुम बाक़ी काम कर लेना। आज तुम्हारे सलाम ने दिल ख़ुश कर दिया! और फिर रसोई में कौन कोई 'देखने' आ रहा की मैं क्या कर रहा हूँ!
-जी साब। जैसा ठीक लगे!

साब खाना बनाने लगे और बासू सोचने लगा की कल फिर ऐसा क्या करूँ की जो सामने वाले साब से अच्छा दिखे।दिखावे का मतलब सिर्फ़ दिखाना तो होता नहीं है, फिर तो कोई मुद्दा ही नही बचा। दिखावा तब सिद्ध होता है, जब देखने वाले से अच्छा हो। 'वर्दी पहिन लहियों काल, वहमा काम बन जइ'।